वाराणसी24 मिनट पहले

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यह फोटो वाराणसी में होने वाले भरत मिलाप कार्यक्रम की है। लेकिन कोरोना के चलते इस बार यह कार्यक्रम नहीं होगा।

  • रामनगर की रामलीला व भरत मिलाप कार्यक्रम लक्खा मेले में है शुमार, शामिल होते हैं लाखों लोग
  • चेतगंज की नक्कटैया लीला पर भी मंडरा रहे कोरोना के संकट, प्रशासन ने अभी तक आयोजन की नहीं दी अनुमति

देश वर्तमान में कोरोना वायरस संक्रमण से जूझ रहा है। इसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ा है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपराएं टूट रही हैं। धर्मनगरी काशी को ही लीजिए, यहां साल 1773 से बंगाली ड्योढ़ी में चली आ रही दुर्गा पूजा इस बार महज औपचारिकताओं में निपटेगी। यहीं से काशी में दुर्गा पूजा की शुरूआत हुई थी। वहीं, विश्वप्रसिद्ध रामलीला, नाटी इमली का ऐतिहासिक भरत मिलाप कार्यक्रम भी नहीं होगा।

यह फोटो रामलीला की है। इसे देखने के लिए लाखों लोग आते थे।- फाइल फोटो

यह फोटो रामलीला की है। इसे देखने के लिए लाखों लोग आते थे।- फाइल फोटो

लक्खा मेले में शुमार है भरत मिलाप

काशी के नाटी इमली में भरत मिलाप मेला लक्खा मेले में शुमार है। रामलीला समिति के प्रबंधक मुकुंद उपाध्याय ने बताया कि लगभग 475 वर्ष पहले यहां रामलीला शुरुआत भगवान राम के भक्त मेघा भगत ने की थी। 5 मिनट के भरत मिलाप को देखने के लिए लाखों लोग आते हैं। लेकिन कोरोना वायरस संक्रमण के चलते इस बार इसका स्वरूप सांकेतिक कर दिया गया है। पहली बार ऐसा होगा कि भक्त लीला को देख नहीं पाएंगे।

बंगाली ड्योढ़ी में पहली बार स्थापित नहीं होगी प्रतिमा

केंद्रीय पूजा समिति के अध्यक्ष तिलक राज ने बताया कि 1773 यानी करीब ढाई सौ साल की परंपरा इस बार कोविड 19 के चलते टूट जाएगी। बंगाली ड्योढ़ी में ही सबसे पहले कोलकाता के आनंद मित्र ने पूजा की शुरुआत की थी। इस बार भीड़ न हो, इसकी वजह से मूर्ति स्थापित न करके कलश स्थापना कर पूजन होगा।

237 वर्षों पुरानी परंपरा में रामनगर की रामलीला भी स्थगित हुई

काशी में रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला पूरे विश्व मे पंच लाइट, बिना ऑडियो सिस्टम और ओपन थियेटर के लिए मशहूर है। एक महीने तक चलने वाली लीला पर जिला प्रशासन ने कोरोना को देखते हुए पहले ही रोक लगा दी है। 1783 में काशी नरेश उदित नारायण ने इसकी शुरुआत की थी। इस दौरान पूरा राम नगर इलाका राम राज्य में तब्दील हो जाता है। पहली बार यह भी परंपरा टूट गयी।

रामनगर की रामलीला का एक दृश्य।

रामनगर की रामलीला का एक दृश्य।

सैकड़ों वर्षों पुरानी चेतगंज की नक्कटैया पर भी संशय

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानी करवा चौथ के दिन नक्कटैया लीला होती है। काशी के लख्खा मेलो में ये भी शुमार है। जिसमें एक लाख से ज्यादा की भीड़ होती है। बाबा फतेराम ने 1887 में चेतगंज के केशवानंद श्रीवास्तव, मुंशी माधोलाल के सहयोग से चेतगंज में लीला का आरंभ कराया था। इस बार इस लीला पर भी कोरोना का ग्रहण मंडरा रहा है।



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By Raj

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