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  • Case Passed In Front Of 12 Judges; The Judge Who Gave The Verdict Today, He Was Posted In Faizabad As A Judicial Officer While Demolishing The Structure In 1992.

लखनऊ10 घंटे पहले

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यूपी के विवादित बाबरी विध्वंस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने आज सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया। फाइल फोटो

  • सीबीआई की विशेष कोर्ट ने सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया
  • जज सुरेंद्र यादव फैसला सुनाने के साथ ही आज रिटायर भी हो गए

28 साल बाद बाबरी मस्जिद विंध्वस मामले में लखनऊ में सीबीआई की विशेष कोर्ट ने सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया। विशेष कोर्ट के जज सुरेंद्र कुमार यादव ने फैसले में कहा कि सीबीआई किसी भी आरोपी के खिलाफ एक भी आरोप साबित नहीं कर सकी। आरोपियों में राम मंदिर आंदोलन के बड़े चेहरे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे नेता भी थे।

जज सुरेंद्र यादव फैसला सुनाने के साथ ही आज रिटायर भी हो गए। यह भी दिलचस्प है कि बाबरी विध्वंस वाले मामले का 28 साल बाद फैसला सुनाने वाले सुरेंद्र यादव की पहली पोस्टिंग बतौर एडिशनल मुंसिफ फैजाबाद (अब अयोध्या) में हुई थी। जब बाबरी ढांचा गिराया गया था, तब भी सुरेंद्र कुमार यादव फैजाबाद में ही पोस्टेड थे। 1993 तक वह फैजाबाद में रहे।

28 साल में 12 जज के सामने से गुजरा केस
बाबरी विध्वंस केस में दो एफआईआर हुईं। इसमें मुकदमा संख्या 197/92 की सुनवाई ललितपुर में होना तय हुआ। जबकि मुकदमा संख्या 198/92 की सुनवाई रायबरेली में होना तय हुआ। लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के बाद ललितपुर से केस लखनऊ की विशेष अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया। जबकि तकनीकी खामियों को चलते रायबरेली कोर्ट में मुकदमा संख्या 198/92 का केस चलता रहा। इस केस से जुड़े रहे वकील एमएम हक और केके मिश्रा ने बताया कि लखनऊ में बनी विशेष कोर्ट में सही मायनों में 2010 के बाद ट्रायल शुरू हुआ। जबकि रायबरेली में सीबीआई की विशेष अदालत में मजिस्ट्रेट के रूप में 2003 में पहला जज नियुक्त किया गया था।

लखनऊ में 10 साल में तीन जजों ने देखा केस
एडवोकेट केके मिश्रा ने बताया कि लखनऊ में स्पेशल कोर्ट का गठन तो 1993 से ही हो गया था। लेकिन इसमें तेजी 2010 के बाद आई। 17 अगस्त 2010 को मुकदमा संख्या 197/92 में आरोपियों के ऊपर आरोप तय किए गए। जबकि 30 सितंबर 2020 को कोर्ट का फैसला आया। 2010 में लखनऊ की विशेष अदालत में जज वीरेंद्र त्यागी थे जिनके कार्यकाल में आरोपियों पर आरोप तय किए गए। इनके बाद शशि मौली तिवारी के सामने केस का ट्रायल शुरू हुआ। फिर 2015 में सुरेंद्र कुमार यादव विशेष कोर्ट में जज बन कर पहुंचे।

2017 में रायबरेली से मुकदमा संख्या 198/92 भी ट्रांसफर होकर लखनऊ पहुंच गया। सुरेंद्र कुमार यादव का कार्यकाल अप्रैल 2019 तक ही था लेकिन केस जल्द खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इनका कार्यकाल बढ़ा दिया था। 30 सितंबर 2020 को फैसला देने के बाद वह रिटायर हो गए हैं।

28 साल बाद फैसला सुनाने वाले जज कौन है?
28 साल बाद फैसला सुनाने वाले जज सुरेंद्र कुमार के बारे में अधिवक्ताओं ने बताया कि मूलतः वह जौनपुर जनपद के पखनापुर गांव के रहने वाले हैं। 31 साल की उम्र में उनका चयन राज्य न्यायिक सेवा के लिए हुआ था। 8 जून 1990 में उनकी पहली पोस्टिंग फैजाबाद में एडिशनल मुंसिफ के पद पर ही हुई थी। फैजाबाद में सुरेंद्र कुमार यादव 31 मई 1993 तक रहे। इसके अलावा वह गाजीपुर, हरदोई, सुल्तानपुर, इटावा के साथ चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट बनकर भदोही और लखनऊ में भी रहे। साथ ही इनकी गोरखपुर में भी पोस्टिंग हुई।

रायबरेली में 9 जजों के सामने से गुजरा केस
सीबीआई की नोटिफिकेशन पर 2003 में पहली बार सीबीआई कोर्ट रायबरेली में बनाया गया। पहली पोस्टिंग यहां अमिताभ सहाय की हुई। वह अप्रैल 2003 तक रहे। इनके बाद जज वीके सिंह की पोस्टिंग हुई, जोकि सितंबर 2006 तक रहे। वीके सिंह वही जज हैं, जिन्होंने लालकृष्ण अडवाणी को आरोपमुक्त कर दिया था।

इसके बाद रिवीजन अपील हुई। जिसमे फिर से अडवाणी पर मुकदमा चलाने का आदेश हुआ। फिर 28 जुलाई 2005 में आरोप तय किए गए। वीके सिंह के बाद ज्ञान प्रकाश आए जो कि 30 मई 2006 से 18 जुलाई 2006 तक जज रहे।

फिर रईस अहमद की पोस्टिंग हुई। दिसंबर 2006 से मई 2007 तक रहे। मई 2007 में वंशराज की पोस्टिंग हुई। जोकि दिसंबर 2008 तक रहे। इनके कार्यकाल में ही पहली गवाही हुई थी। 5 दिसंबर 2007 को पहली गवाही हनुमान प्रसाद की हुई। इन्हीं के कार्यकाल में एक और बात हुई जब राम विलास वेदांती ने खुद का नाम बतौर अभियुक्त शामिल करने की एप्लीकेशन डाली। 2017 में सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बाद केस लखनऊ की विशेष अदालत में ट्रांसफर हो गया।



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By Raj

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