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रायबरेली4 घंटे पहले

यूपी के रायबरेली के रहने वाले शहीद शैलेंद्र सिंह का पार्थिव शरीर आज उनके पैतृक गांव पहुंचा। वह सोमवार को सोमवार को आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए थे।

  • शैलेंद्र का सोपोर से रामपुर तबादला हो चुका था
  • दस दिन बाद 15 अक्टूबर को घर आने वाले थे

कश्मीर के सोपोर में सोमवार को शहीद हुए यूपी के रायबरेली जिले के लाल शैलेंद्र प्रताप सिंह का पार्थिव शव तिरंगे में लिपटा हुआ पहुंचा तो हर आंखें छलक उठीं। इस बीच लोगों में आतंकियों के शरणदाता देश पाकिस्तान को लेकर भारी आक्रोश देखने को मिला। लोगों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए। सीआरपीएफ के डीआईजी भी शहीद के घर पहुंचे। बुधवार को डलमऊ स्थित गंगा घाट पर शहीद की अंत्येष्ठि होगी।

जानकारी के अनुसार, डलमऊ क्षेत्र के अल्हौरा गांव के मूल निवासी शहीद शैलेंद्र सिंह दस साल पहले सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। उनमें शुरू से ही देश सेवा का जज्बा था। इधर शहीद शैलेंद्र सिंह का सोपोर से रामपुर तबादला हो चुका था, दस दिन बाद 15 अक्टूबर को वह घर आने वाले थे।

ट्रांसफर के चलते दो माह की छुट्टी मिली थी। लेकिन कल हुए आतंकवादी हमले में शैलेंद्र के शहीद होने की दुखद सूचना सेना के अधिकारियों ने फोन से घर वालों को दी। शहीद के मौसा ने बताया कि दस दिन बाद ही वह घर आने वाला था, उसे दो माह की ट्रांसफर लीव मंजूर हुई थी। घर वाले भी खुश थे कि शैलेंद्र अब कुछ दिन यहां हम लोगों की बीच रहेगा।

शैलेंद्र की पत्नी और इकलौते बेटे का रो रोकर बुरा हाल
शहीद शैलेंद्र सिंह की शादी सलोन क्षेत्र के करहिया बाजार के पास एक गांव में हुई थी। पत्नी चांदनी सिंह और सात साल का इकलौता बेटा तुषार सिंह यहीं दादी-बाबा के पास रहते थे। तुषार लखनऊ पब्लिक स्कूल में कक्षा दो में पढ़ता है। बेटा अभी कुछ समझ ही नहीं पा रहा है। घर के सभी लोगों को रोते देखकर वह भी बीच-बीच में रोने लगता है।

शहीद के पिता नरेंद्र ने शहर की मलिक मऊ कॉलोनी में अपना आवास बनाया हुआ है। नरेंद्र बहादुर सिंह आईटीआई में कार्यरत थे। दस साल पहले वह आईटीआई से सेवानिवृत्त हुए थे और पूरे परिवार के साथ वह यहीं रह रहे हैं। शहीद शैलेंद्र तीन बहनों के बीच अकेले भाई थे। दो बहनों-शीलू और प्रीति की शादी हो चुकी है। सबसे छोटी बहन ज्योति पिता-मां के साथ ही रहती है।

फरवरी में आखिरी बार छुट्टी पर आए थे शैलेंद्र
शहीद शैलेंद्र आखरी बार फरवरी माह में छुट्टी पर घर आए थे, उन्होंने छोटी बहन की शादी की तैयारियों के लिए ही शहर के मलिकमऊ कॉलोनी स्थित घर पर कुछ काम करवाया था। कुछ काम छूट गया था। कह गए थे कि अगली बार जब अवकाश पर आएंगे तब काम पूरे कराएंगे। छोटी बहन के लिए लड़का देखने आदि की प्रक्रिया भी चल रही थी। मौसा ज्ञानेंद्र ने बताया कि दो-तीन जगह बात भी चली लेकिन बात बन नहीं पाई थी। भाई की शहादत के बाद छोटी बहन ज्योति मारकर रोती हुई कह रही है-‘अब बिना भइया के कैसे जीवन बीतेगा?’



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By Raj

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