वाराणसी38 मिनट पहले

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DLW पहले केवल डीजल इंजन के लिए दुनिया में मशहूर था,अब इलेक्ट्रिकल इंजन भी बनता है। जनवरी 1976 में पहला इंजन तंजानिया को निर्यात किया गया था।

  • इससे पहले मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर बनारस रेलवे स्टेशन किया गया था
  • बनारस रेल इंजन कारखाने में अब इलेक्ट्रिकल इंजन का उत्पादन अधिक होता है

डीरेका रेल-इंजन कारखाने का नाम बदलकर बनारस रेल इंजन कारखाना होगा। रेल मंत्रालय ने शुक्रवार देर शाम आदेश पत्र जारी किया। 27 अक्टूबर को सचिव सुशांत मिश्रा के ओर से पत्र जारी किया गया था। डीजल रेल इंजन कारखाने के नामकरण को लेकर एक साल से कवायद चल रही थी।

इससे पहले मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन का नाम बदला था

करीब दो महीने पहले रेल मंत्रालय की ओर जारी पत्र में मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर बनारस स्टेशन कर दिया गया था। इसको लेकर काशी से तमाम समाजसेवियों ने मुहिम भी चलाई थी। DLW की नींव 23 अप्रैल 1956 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने रखी थी। 1961 में यहां डीजल इंजन बनना शुरू हो गए थे। 1964 में देश को पहला इंजन समर्पित हुआ था। डीरेका में अब इलेक्ट्रिकल इंजन का उत्पादन ज्यादा होता है।

तीन नामों पर हुई थी चर्चा

डीरेका रेल-इंजन कारखाने का नाम बदलने के लिए तीन नामों पर चर्चा हुई थी। मंत्रालय को भेजे गए तीन नामों में दीनदयाल लोको वर्क्स, बनारस लोकोमोटिव और काशी लोकोमोटिव शामिल थे। रेल मंत्रालय ने मुहर बनारस रेल इंजन कारखाना नाम पर मुहर लगाई है।



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By Raj

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