लोकसभा में मोदी का भाषण: प्रधानमंत्री संसद में बचाव की मुद्रा में भी दिखे और फिर से तथ्यों की गलती भी कर गए, वो भी दो-दो बार


  • Hindi News
  • National
  • Narendra Modi Speech Major Points | PM Narendra Modi In Parliament, Loksabha Today News Updates; PM Modi, New Agriculture Law, PM On Farmer Protest

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

नई दिल्ली5 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक
  • पीएम के जवाब से एक बात साफ- सरकार कृषि कानूनों से पीछे नहीं हटेगी
  • अपने बचाव के लिए आंदोलनजीवियों और आंदोलनकारियों में अंतर बताया
  • अंबानी-अडाणी उद्यमियों का भी बचाव किया, कहा- वे समाज के लिए जरूरी

प्रधानमंत्री मोदी बुधवार शाम लोकसभा में बोलते हुए कई दफा बचाव की मुद्रा में भी दिखे। खासकर आंदोलनजीवी वाले बयान पर। इसके साथ ही अपनी बातों के पक्ष में दलीलें देते हुए फिर से गलती कर गए।

पहले बात बचाव की…
मोदी ने किसान आंदोलन को पवित्र बताया और इस दौरान आंदोलनकारियों और आंदोलनजीवियों में अंतर बताने की कोशिश की। बोले- ‘किसान आंदोलन को मैं पवित्र मानता हूं। भारत के लोकतंत्र में आंदोलन का महत्व है, लेकिन आंदोलनजीवी पवित्र आंदोलन को अपने लाभ के लिए अपवित्र कर रहे हैं। किसानों के पवित्र आंदोलन को बर्बाद करने का काम आंदोलनकारियों ने नहीं, आंदोलनजीवियों ने किया है। आंदोलनकारियों और आंदोलनजीवियों में फर्क करना जरूरी है।’

दरअसल सोमवार को राज्यसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री किसान आंदोलन के संदर्भ में आंदोलनजीवी बोल गए थे। तब से बहस चल पड़ी थी। बुधवार को मोदी इसी पर पानी डालते दिखे।

अब बात गलतियों की…
मांग नहीं तो कानून क्यों? मोदी ने दलील खारिज की पर गलत तथ्यों पर

प्रधानमंत्री ने उस तर्क को खारिज किया, जिसमें कहा जा रहा है कि किसान कानूनों की मांग किसी ने की ही नहीं तो इसे लाया क्यों गया? मोदी ने सवाल किया कि क्या कानून तभी बनाए जाएंगे, जब उसकी मांग होगी? इस दौरान उन्होंने कई पुराने कानूनों की हवाला देते हुए विपक्ष से पूछा कि इन कानूनों की किसने मांग की थी?
प्रधानमंत्री ने जिन कानूनों का उदाहरण दिया उनमें दहेज प्रथा के खिलाफ कानून और बाल विवाह के खिलाफ कानून का भी जिक्र था, लेकिन इसका सच कुछ और है। दोनों कानून लंबे आंदोलनों के बदौलत ही बने हैं।

दहेज के खिलाफ कानून के लिए 10 साल आंदोलन चला था
दहेज प्रथा के खिलाफ पहला कानून (डावरी प्रोहिबिशन एक्ट) 1961 में बना था, पर यह बहुत लचीला था। 1972 में दहेज के खिलाफ कड़े कानून के लिए शहादा आंदोलन शुरू हुआ। 3 साल बाद 1975 में प्रोग्रेसिव ऑर्गनाइजेशन ऑफ वुमन ने हैदराबाद में भी आंदोलन शुरू किया। इसमें 2 हजार महिलाएं शामिल थीं। 1977 में इस आंदोलन को दिल्ली की महिलाओं का साथ मिला।

1979 में दिल्ली की सत्यरानी चंदा की बेटी की दहेज के लिए जलाकर हत्या कर दी गई, जिसके बाद उन्होंने कड़े कानूनों के लिए मोर्चा खोल दिया। 1983 में डावरी एक्ट को संशोधित किया गया। इसके तहत दहेज की मांग और दहेज के लिए होने वाली हिंसा की रोकथाम के लिए कानून सख्त किया गया।

बाल विवाह कानून के लिए राजा राममोहन ने की थी मांग
राजा राममोहन राय ने बाल विवाह रोकने के लिए लंबा संघर्ष किया। उनकी मांग थी कि कम उम्र की लड़कियों के विवाह पर रोक लगाई जाए। उनकी मांग पर ब्रिटिश सरकार ने बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम-1929 को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ऑफ इंडिया में पास किया था। तारीख 28 सितंबर 1929 थी।

लड़कियों की शादी की उम्र 14 साल और लड़कों की 18 साल तय की गई। राजीव गांधी सरकार में इसमें संशोधन कर लड़कियों के लिए शादी की उम्र 18 और लड़कों के लिए 21 साल की गई। इसकी पहल करने वाले हरविलास शारदा थे। इसलिए इसे ‘शारदा अधिनियम’ के नाम से भी जाना जाता है।

नाम वैल्थ क्रिएटर्स का, बचाव अडाणी-अंबानी का
प्रधानमंत्री ने किसानों के निशाने पर आए अडाणी और अंबानी जैसे उद्यमियों का भी बचाव किया। उन्होंने किसी उद्यमी का नाम लिए बिना कहा कि देश के लिए प्राइवेट सेक्टर भी जरूरी है। पीएम ने कोरोना वैक्सीन की तरफ इशारा करते हुए कहा कि देश आज मानवता के काम आ रहा है तो इसमें प्राइवेट सेक्टर का बहुत बड़ा योगदान है। देश के लिए वैल्थ क्रिएटर्स जरूरी हैं। निजी क्षेत्र के खिलाफ अनुचित शब्दों का इस्तेमाल करने से अतीत में कुछ लोगों को वोट मिल सकते थे, लेकिन अब वह समय नहीं।



Source link

By Raj

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *