मोदी काल का पहला चुनाव, जिसमें शाह नदारद, लालू पोस्टर तक से गायब; 71 सीटों पर 28 को वोटिंग


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पटना12 घंटे पहलेलेखक: नागेंद्र

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  • पटना, बक्सर, भोजपुर समेत 16 जिलों की 71 सीटों के लिए 1,066 उम्मीदवार मैदान में हैं, इनमें 952 पुरुष और 114 महिलाएं
  • बुधवार को 2 करोड़ 14 लाख 6 हजार 96 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, 17 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला

‘‘बिहार 2020’ के पहले मैच के लिए पिच रेडी है। चुनाव-प्रचार बंद होने के साथ असल गुणा-भाग चालू हो चुका है। पटना, बक्सर, भोजपुर समेत 16 जिलों की 71 सीटों के लिए 1,066 उम्मीदवार मैदान में हैं। 54 जगह सीधा तो 17 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला दिख रहा है। 114 महिलाएं भी मैदान में हैं। 2 करोड़ 14 लाख 6 हजार 96 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। वोटिंग बुधवार यानी 28 अक्टूबर को है।

पिछले कुछ चुनावों को देखें तो 2000 के बाद का यह सबसे रोचक और रोमांचक मुकाबला होगा। 2000 में लालू ‘सुपर पावर’ थे और लड़ाई के केंद्र में थे। इस बार ‘सुशासन बाबू’ नीतीश कुमार और उनके ‘निश्चयों’ की साख केंद्र में है। लालू उस रण में धराशाई हो गए थे। यह रण नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य तय करने जा रहा है। दो नए चेहरों, तेजस्वी यादव और चिराग पासवान के राजनीतिक भविष्य की नींव भी पड़नी है। यह कितनी पुख्ता होकर सामने आती है, वक्त तय करेगा।

हालांकि, पहले रण की तारीख करीब आते-आते लड़ाई जिस तरह ‘अपने बाप-दादाओं से पूछो उस राज का हाल’ जैसे जुमलों तक पहुंची है, उसने जमीनी मुद्दों से दूर ले जाकर इसकी दिशा तय करने की कोशिश ही दिखाई है।

इस चुनाव के कुछ खास सिरे हैं। पहली बार होगा जब राजद सुप्रीमो लालू यादव मैदान में ही नहीं राजद के बैनर-होर्डिंग से भी गायब हैं (हालांकि, सत्तापक्ष की ओर से लड़ाई की धुरी उन्हीं को बनाने की बार-बार कोशिश हो रही है)। एक बिलकुल नया चेहरा पुष्पम प्रिया चौधरी के रूप में ‘प्लूरल्स’ नाम से नए दल के साथ मैदान में है। वो रण में जहां भी ठहरें, पर खबरों में बनी हुई हैं। हां, चुनावी रण में अब तक भाजपा के कद्दावर चेहरे और असल रणनीतिकार अमित शाह का न उतरना भी चर्चा में है। भाकपा-माले का पहली बार किसी गैर वाम गठबंधन में आना और वह भी राजद के साथ, यह इस चुनाव की शायद सबसे बड़ी घटना भी है।

तीन चरणों में होने वाले इस रण के सारे प्रमुख चेहरे मैदान में उतर चुके हैं। नरेंद्र मोदी हैं, नीतीश कुमार हैं, राहुल गांधी भी आ चुके हैं। दो नये चेहरे तेजस्वी यादव और चिराग पासवान नई उम्मीदों के साथ मैदान में हैं। यानी तस्वीर इतनी तो साफ है कि एक तरफ चेहरे हैं, दूसरी ओर लेखा-जोखा। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने चेहरे हैं। दोनों ‘लेखा-जोखा’ लेकर घूम रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि बिहार का वोटर इस बार ‘चेहरा’ देखता है या ‘लेखा-जोखा’। संभव है ‘दोनों के मिक्स’ के साथ कुछ नई खिचड़ी पका दे। हालांकि, लंबे अंतराल के बाद बिहार के चुनाव में इस बार मुद्दा बहुत ठीक से मुखर हुआ है और वह है रोजगार का। तय है कि यह युवा मतदाता के फैसले की एक बड़ी वजह बनेगा और शायद निर्णायक भी।

इस चुनाव की एक और भी चुनौती है, और वह है कोरोना के कारण वोटिंग पर पड़ने वाले विपरीत असर की आशंका। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में मतदान के शुरुआती प्रतिशत ने आयोग के साथ-साथ राजनीतिक दलों की भी चिंता बढ़ा दी है। यह वोटर की इस घटी हुई संख्या से होने वाले संभावित नफा-नुकसान के आकलन का भी वक्त है।

पहले रण की इस लड़ाई की कुछ खास बातें हैं। भावी बिहार की कप्तानी के लिए असल टीम यहीं से बनने-बिगड़ने वाली है। पहला मैच यानी पहला चरण बहुत कुछ तय कर देगा। इस इलाके से अगर महागठबंधन की उम्मीद टिकी हुई है, तो राजग यानी एनडीए की आस-निराश भी इसी पर निर्भर है। यही तय करेगा कि राजनीति किस ओर जा रही है। यानी, इस चरण में जिसकी नाव पार लग गई, उसकी आगे की लड़ाई आसान हो जाएगी। कुल मिलाकर ‘एकतरफा नतीजों की सोच’ के साथ शुरू हुआ यह दौर अब रोचक मुकाबले में तब्दील हो चुका है।

बिहार के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला यह मुकाबला सीधे तौर पर नीतीश कुमार की 15 साल की सत्ता के बाद बनी ‘पक्ष-विपक्ष की लहर’ और तेजस्वी यादव के उस चेहरे के बीच है, जिस पर ‘सत्ता सुख’ का कोई सीधा दाग नहीं है। हालांकि, पिता लालू प्रसाद के कार्यकाल के बहाने नीतीश कुमार के आक्रामक बयानों, भाजपा की वर्चुअल से लेकर फिजिकल रैलियों की सफलता के ग्राफ के बीच तेजस्वी यादव की रैलियों में उमड़ी अप्रत्याशित भीड़ ने सबको सतर्क जरूर कर दिया है।

चुनावी रणनीतिकार से लेकर राजनीतिक समीक्षक तक इसे लेकर हैरान हैं। चुनाव का ग्राफ चढ़ते-चढ़ते राजद पर बढ़े हमलों ने जैसे इसे तेजस्वी बनाम बाकी की लड़ाई में तब्दील कर दिया हो। तेजस्वी भी इस लड़ाई को भुनाने में पीछे नही हैं। अपनी चुनावी रैलियों से लेकर लाइव इंटरव्यू तक में बड़ी मासूमियत से अपने ‘एक हेलीकाप्टर बनाम उनके 20’ की बात कहकर संदेश देने में कोताही नहीं करते।

लड़ाई में अचानक भाजपा और नीतीश की ओर से भाकपा-माले और राजद के रिश्तों पर हमले शुरू हुए, तो उसने इसे एक नया रंग तो दिया ही, चर्चा का नया मसाला भी। इस नये हमले ने कांग्रेस की जिद में गई जरूरत से ज्यादा सीटों को भी चर्चा में ला दिया है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस अगर 40-50 सीटों तक ही खुद को सीमित रखती और बाकी सीटें राजद और वामदलों, खासकर माले के पास गई होतीं तो लड़ाई अब तक ज्यादा रोमांचक रूप ले चुकी होती।



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By Raj

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