भास्कर ओरिजिनल: 1951 के बाद सबसे बुरे दौर में रेलवे; डगमगा रहे फ्यूचर प्रोजेक्ट, फ्रीज हो गईं 50% नौकरियां


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34 मिनट पहलेलेखक: जनार्दन पांडेय

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1910 के दशक में इंडियन रेलवे पर प्रकाशित ‘कूच परवा नय पुर रेलवे’ नाम की स्केच बुक खूब मशहूर हुई। वजह, जबर्दस्त व्यंग से भरे स्केच; जैसे- ‘रेलवे कर्मी काम पर हैं’ कैप्शन वाले स्केच में चीफ इंजीनियर ऑफिस में नाच का लुत्फ ले रहे हैं, एक कर्मचारी मैनेजर को पंखा हांक रहा है और ट्रेन की पटरी पर हाथी सोया है। ये सब इशारे थे कि रेल सेवा की बागडोर ऐसे हाथों में है, जिन्होंने इसे मतवाला हाथी बना दिया है।

1910 में गुमनाम तरीके से प्रकाशित स्केच बुक का 22वां पन्ना- रेलवे कर्मी काम पर हैं।

1910 में गुमनाम तरीके से प्रकाशित स्केच बुक का 22वां पन्ना- रेलवे कर्मी काम पर हैं।

ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे की पत्रिका में छपने के बाद ये स्केच बुक बहुत मशहूर हुई थी।

ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे की पत्रिका में छपने के बाद ये स्केच बुक बहुत मशहूर हुई थी।

स्केच बुक गुमनाम आर्टिस्ट ने बनाई थी, लेकिन हर स्केच पर उसका सिग्नेचर था- जो हुक्म।

स्केच बुक गुमनाम आर्टिस्ट ने बनाई थी, लेकिन हर स्केच पर उसका सिग्नेचर था- जो हुक्म।

110 साल बाद भी ये स्केच बुक प्रासंगिक है। अंग्रेजी लहजे में बोले गए तीन शब्द ‘कूच, परवा, नय यानी कुछ परवाह नहीं’ नाम की ये व्यंग से भरी स्केच बुक आज के रेलवे संचालन के तौर-तरीकों से एकदम मेल खाती है। आइए कुछ नए स्केच खींचते हैं; व्यंग के लिए नहीं, असलियत में भारतीय रेल को जानने के लिए।

2 साल पहले ही 1951 के बाद सबसे बुरे ऑपरेटिंग रेशियो पर पहुंच गया था रेलवे

रेलवे की हालत जानने आसान तरीका है, ऑपरेटिंग रेशियो। यानी ‌100 रुपये कमाने के लिए रेलवे को ईंधन पर, इंजन पर, स्टेशन और ‌डिब्बों की मरम्मत पर, ट्रैक रिन्यू करने पर, कर्मचारियों के वेतन आदि सभी मदों पर कुल कितने रुपये खर्च करने पड़े। इससे आप 70 साल पहले से लेकर आज तक की रेल सेवा की हालत अंदाजा लग लेंगे। जिन सालों में खर्च कम रहा, उस साल में सबसे ज्यादा कमाई।

2017-18 के ऑपरेटिंग रेशियो 98.44 को 1951 के बाद सबसे खराब बताया गया। साल 2018-19 में रेलवे ने ऑपरे‌टिंग रेशियो 96.20 दिखाया, लेकिन CAG की ऑडिट रिपोर्ट में इस पर सवाल खड़े किए गए। दावा था कि रेलवे ने 100 रुपए की कमाई के लिए 101.77 रुपए खर्च किए, जो रेलवे के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा घाटा था। साल 2019-20 में ऑपरेटिंग रेशियो 98.41 रहा। वरिष्ठ पत्रकार श्रीनद झा कहते हैं कि बीते 10 सालों में टिकट के दाम में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। राजनेता डरते हैं। राजनीतिक फायदे के चक्कर में रेलवे के नुकसान की अनदेखी होती है।

इंडियन रेलवे, कोरोना के पहले और कोरोना के बाद

पहले ही घाटे की मार झेल रही इंडियन रेलवे के लिए कोरोना ने नई रणनीति बनाने का मौका दिया। उत्तर रेलवे के एक अधिकारी कहते हैं कि कोरोना के बाद राजधानी, भोपाल एक्सप्रेस, लखनऊ मेल, प्रयागराज एक्सप्रेस, जयपुर जोधपुर एक्सप्रेस और साबरमती जैसी ट्रेन चलाई गईं, जिनमें सबसे ज्यादा कमाई है। एसी कोच में तकिया-कंबल सेवा बंद कर दी गई, लेकिन कोविड स्पेशल ट्रेन का किराया कम नहीं हुआ।

हालांकि, लॉकडाउन के बाद अब तक 10% ट्रेन भी शुरू नहीं की जा सकी हैं। इसके बावजूद काम पर लौटे कर्मचारियों में अब तक 30 हजार से ज्यादा को कोरोना हो चुका है और 700 की मौत हो चुकी है।

ट्रेन बंद होने का आम जिंदगी पर ऐसा असर, 330 के बजाए खर्च हुए 7000
पंकज बताते हैं कि उनके दोस्त रोजाना ट्रेन से 75 किमी की यात्रा करके गोरखपुर नौकरी के लिए जाते थे। इसके लिए वो 330 रुपए का रेल पास बनवाते थे। मार्च में ट्रेन बंद होने पर उन्हें शहर में 7000 रुपये का घर लेना पड़ा। जब ट्रेन खुली तो पास करीब 700 में बन रहे हैं। इसी तरह बिहार के अररिया जिले की छोटी-सी जगह फारबिसगंज में रहने वाले कृष्‍णा मिश्रा कहते हैं कि उनके यहां 8 जोड़ी ट्रेन आती थीं। वहां से सैकड़ों रिक्‍शेवालों और करीब 100 दुकानदारों की रोजी चलती थी। अब वहां न रिक्‍शेवाले हैं, न ही कोई दुकानदार।

अभी ऐसी कोई स्टडी सामने नहीं आई है, जिसमें रेलवे के रुकने से आम लोगों को कितना नुकसान हुआ है, इसका आकलन हो सके। लेकिन, इन दो केस स्टडी से पता चलता है कि ट्रेन रुकने से पंकज के दोस्त को महीने में 330 के बजाए 7000 रुपए खर्च करने पड़े और कृष्‍णा मिश्रा के कस्बानुमा छोटे शहर में ट्रेन रुकने से सैकड़ों की रोजी कमाने का जरिया बंद हो गया।

इंडियन रेलवे की 1.40 लाख वैकेंसी में 50% पर रोक

कोरोना के पहले भारतीय रेलवे में 1.40 लाख पदों पर भर्तियां निकाली थीं। लेकिन, कोरोना काल के बाद 50% भर्तियों पर रोक लगा दी गई है। अब नए सिरे से भर्तियों को लेकर समीक्षा होगी, तब अगली भर्ती की जाएगी।

रेलवे के प्राइवेटाइजेशन का काम भी रुका

संयोग से कोरोना उसी वक्त आया, जब सरकार ने भारतीय रेलवे की 2,800 मेल ट्रेन में से 151 ट्रेनों को बेचने के प्लान को हरी झंडी दिखाई थी। रेलवे में 5% प्राइवेटाइजेशन के तहत 2023 में 151 हाई-स्पीड ट्रेन चलने का लक्ष्य रखा गया था। दिसंबर में इनकी बोलियां लगनी थी, लेकिन कोरोना के चलते ये काम रुका हुआ है। अभी इस पर कोई ताजा जानकारी सरकार ने नहीं दी है।

रेलवे बोर्ड चेयरमैन और सीईओ वीके यादव का कहना है कि पैंडेमिक के बाद रेलवे ने मालगाड़ियों में 98% लोडिंग की है। किसान रेल, नए किस्म के बन रहे लोकोमोटिव और कर्मचारियों की मेहनत हमें पटरी से नहीं उतरने देंगी। तमाम चुनौतियों के बीच 12 मई को रेलवे ने एक कविता ट्वीट की थी; इस में फिर चल पड़ने की उम्मीद जताई गई थी।

ना आपातकाल में रुकी थी, ना युद्धकाल में थमी हूं!

सावधानी थी समय की मांग, उसे पूरा करने में जुटी हूं!

देशवासियों की सेवा में, स्टेशन पर तैयार खड़ी हूं!

मैं भारत की जीवन रेखा, करने देश की सेवा, फिर से अपनों को अपनों से मिलाने, आज फिर से चल पड़ी हूं!

भारतीय रेल !



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By Raj

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