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एक महीने पहले

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  • फ्लेक्सिबल इनफ्लेशन टारगेटिंग यानी 4 पर्सेंट के पक्के टारगेट के साथ महंगाई के लिए 2 से 6 पर्सेंट के बीच का दायरा इसी वित्त वर्ष के अंत तक लागू है
  • खुदरा महंगाई दर वाले सूचकांक से जुड़े फ्लेक्सिबल इनफ्लेशन टारगेटिंग यानी महंगाई को कंफर्टेबल रेंज में रखने का तरीका अगस्त 2016 में अपनाया गया था

कोविड-19 के दौरान आपूर्ति के मोर्चे पर लगे झटके को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मैंडेट के हिसाब से महंगाई को नॉमिनल एंकर यानी 4 पर्सेंट के टारगेट तक समेटने की कोशिशों में थोड़ी ढिलाई बरती। महंगाई के लिए फ्लेक्सिबल इनफ्लेशन टारगेटिंग यानी इसको 2 से 6 पर्सेंट के दायरे में रखने वाली मौजूदा व्यवस्था इसी फाइनेंशियल के अंत तक के लिए लागू है। अब इसकी समीक्षा होगी तो अब यह सवाल उठता है कि क्या वह इस व्यवस्था को छोड़कर नॉमिनल एंकर यानी 4 पर्सेंट का फिक्स्ड टारगेट अपनाएगा।

मई 2016 में मॉनेटरी पॉलिसी का अहम मकसद बना था इनफ्लेशन टारगेटिंग

फरवरी 2015 में सरकार और रिजर्व बैंक ने महंगाई के लिए दायरा बाँधने की कोशिश शुरू की थी ताकि उसको संभालते हुए अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त गुंजाइश बने। सरकार ने मई 2016 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट, 1934 में बदलाव करते हुए कीमतों में स्थिरता को RBI की मॉनेटरी पॉलिसी का अहम मकसद बना दिया। इसके लिए RBI ने खुदरा महंगाई दर वाले सूचकांक (CPI) से जुड़े फ्लेक्सिबल इनफ्लेशन टारगेटिंग यानी महंगाई को अपने कंफर्टेबल रेंज में रखने वाला तरीका अपनाया। अगस्त 2016 में सरकार ने महंगाई के लिए 4 पर्सेंट का पक्का टारगेट तय किया और 31 मार्च 2021 के लिए 2 से 6 पर्सेंट का दायरा बनाया।

ग्रोथ की जरूरतों और सप्लाई साइड के शॉक को बैलेंस किया जा सकता है

इस बारे में ब्रोकरेज फर्म निर्मल बंग का कहना है कि महंगाई को 4 पर्सेंट पर फिक्स रखने का टारगेट तय करने के बजाय उसमें फ्लेक्सिबिलिटी होनी चाहिए जो कई वजहों से मुमकिन है। पहली, इसमें इकनॉमिक ग्रोथ की जरूरतों और सप्लाई साइड के शॉक को बैलेंस किया जा सकता है। इनफ्लेशन टारगेटिंग का फायदा यह है कि इसमें मॉनेटरी पॉलिसी के नियमों और विवेक, दोनों का पहलू जुड़ा होता है। मीडियम टर्म में महंगाई के लिए पक्का टारगेट तय किया जाता है, साथ ही शॉर्ट टर्म में इकनॉमिक शॉक से निपटने की सहूलियत होती है।

CPI में उतार-चढ़ाव को दुरुस्त करने में फूड इनफ्लेशन का अहम रोल

दूसरी वजह यह है कि खुदरा मूल्य सूचकांक में खाने-पीने के सामान का वज़न ज्यादा होने के बावजूद CPI को नॉमिनल एंकर बनाना सही रहेगा। CPI में मीडियम टर्म में होने वाले उतार-चढ़ाव को दुरुस्त करने में खाने-पीने के सामान के दाम में उतार-चढ़ाव का अहम रोल होता है। दूसरे देशों के अनुभव से भी पता चलता है कि फ्लेक्सिबल टारगेट महंगाई को 4 पर्सेंट पर फिक्स रखने से बेहतर होगा।

टारगेट फिक्सिंग आर्थिक विकास के पैमाने पर देशों की स्थिति पर निर्भर

आर्थिक सिद्धांतों के मुताबिक महंगाई के लिए टारगेट फिक्सिंग आर्थिक विकास के पैमाने पर देशों की स्थिति पर निर्भर करता है। भारत जैसे देश के लिए फ्लेक्सिबल इनफ्लेशन टारगेट रखना सही रहेगा जो तेज आर्थिक तरक्की के साथ ही महंगाई को काबू में कंफर्टेबल जोन में रखने में कामयाब रहा है।



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By Raj

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