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18 दिन पहले

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  • US में कंपनी बनाने के लिए गलत जानकारी देने पर प्रमोटर को तीन साल की जेल हो सकती है
  • कंपनी के रिटर्न फाइलिंग में कोताही पर यहां पांच साल के लिए डिस्क्वॉलिफाई हो जाते हैं डायरेक्टर

अमेरिकी सरकार ने शेल यानी मुखौटा कंपनियों को देश से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनाया है। शुक्रवार को अमेरिकी संसद में पास नए कानून को नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट का हिस्सा बनाया गया है। कंपनियों को बेनेफिशियरी ओनरशिप (असल मालिकाना हक) के बारे में ट्रेजरी डिपार्टमेंट के फाइनेंशियल क्राइम्स एनफोर्समेंट यूनिट को बताना होगा। कंपनी बनाने के लिए गलत जानकारी देने पर तीन साल की जेल हो सकती है। इस कानून को कॉरपोरेट ट्रांसपेरेंसी के लिए काम कर रहे संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने ऐतिहासिक बताया है।

फरवरी 2017 में PMO की तरफ से टास्कफोर्स बनाया गया था

यह तो रही अमेरिका में आजकल की बात, भारत में शेल कंपनियों के पीछे सरकार काफी समय से सक्रियता से पड़ी रही है। लगभग चार साल पहले फरवरी 2017 में मुखौटा कंपनियों पर अंकुश लगाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से टास्कफोर्स बनाया गया था। इस टास्कफोर्स का मकसद टैक्स चोरी सहित कई तरह के गलत काम करने वाली कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए कई एजेंसियों के साथ मिलकर व्यवस्थित तरीके से काम करना था।

भारत में नहीं है मुखौटा कंपनियों की आधिकारिक परिभाषा

अमेरिका के सिक्योरिटीज एक्ट में तो शेल यानी मुखौटा कंपनियों को बिजनेस के साइज और एसेट के हिसाब से परिभाषित किया गया है लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। ऐसे में हम इसके बारे में बिजूका के उदाहरण से अंदाजा लगा सकते हैं। खेत में खड़ा बिजूका, जो आदमी की तरह दिखता है लेकिन आदमी जैसा कुछ नहीं होता, खोखला होता है।

न संपत्ति होती है, न देनदारी, बस होता है तो वित्तीय लेनदेन

कंपनी के हिसाब से इसको देखें तो यह कागज पर बना कारोबार होता है, जो असल में होता ही नहीं क्योंकि इसके पास न तो संपत्ति होती है, न देनदारी, बस होता है तो वित्तीय लेनदेन। मुखौटा कंपनियों को पकड़ने के लिए भारत में पहले कंपनी अधिनियम 2013 के सेक्शन 248 का सहारा लिया गया, फिर 2019 में कंपनी कानूनों में संशोधन करके सेक्शन 10ए बनाया गया और सेक्शन 12 में सब सेक्शन 9 जोड़ा गया।

कंपनी मामलों के मंत्रालय ने 2,09,032 कंपनियों के पंजीकरण रद्द किए थे

अब भारत में मुखौटा कंपनियों पर शिकंजा कसने वाली व्यवस्था की शुरुआत में थोड़ा झांक लेते हैं। यह फरवरी 2017 में शुरू हुआ था जब पीएमओ की तरफ से शेल कंपनियों पर लगाम के लिए वही टास्क फोर्स बनाया गया जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं। इसके छह महीने बाद अगस्त में सेबी ने स्टॉक एक्सचेंजों को 331 संदिग्ध मुखौटा कंपनियों पर कार्रवाई करने और उनके शेयरों में ट्रेडिंग पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। उसी साल सितंबर में कंपनी मामलों के मंत्रालय ने नियमों के हिसाब से नहीं चल रहीं 2,09,032 कंपनियों के पंजीकरण रद्द कर दिए थे। वित्त मंत्रालय ने बैंकों को इन कंपनियों के निदेशकों और उनके प्रतिनिधियों के खातों से लेनदेन पर पाबंदी लगाने का निर्देश दिया था। कंपनी मामलों के मंत्रालय ने 12 सितंबर 2017 को कंपनी अधिनियम 2013 के तहत डिस्क्वॉलिफिकेशन के लिए 1,06,578 निदेशकों की पहचान की थी।

15 लाख कंपनियों में छह लाख कंपनियां एनुअल रिटर्न फाइल कर रही थीं

वित्त मंत्रालय की तरफ से 2017 में जारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 15 लाख पंजीकृत कंपनियों में से सिर्फ छह लाख कंपनियां ही नियमित रूप से एनुअल रिटर्न फाइल कर रही थीं। यह आंकड़े देते हुए मंत्रालय ने कहा था कि संभवत: ये कंपनियां वित्तीय अनियमितताओं को छुपाने के लिए बनाई गई हो सकती हैं और जांच एजेंसियों से मिली सूचना के आधार पर 16,794 मुखौटा कंपनियों की पहचान की गई है।

पंजीकरण के एक साल के भीतर कामकाज शुरू नहीं करने पर कटता है नाम

दरअसल कंपनीज ऑफ रजिस्ट्रार उन कंपनियों के नाम अपनी बही से काट सकता है, जो पंजीकरण के एक साल के भीतर कामकाज शुरू नहीं करती हैं या कंपनी दो साल तक कोई कारोबार नहीं करती है और डॉरमेंट कंपनी के दर्जे की अर्जी नहीं देती है। उसको यह अधिकार कंपनी अधिनियम 2013 के सेक्शन 248 के तहत मिला हुआ है और कंपनी रजिस्ट्रार को 2019 में संशोधित कंपनी कानून के सेक्शन 12 के सब सेक्शन 9 के तहत कंपनी का फिजिकल वेरिफिकेशन करने का भी अधिकार है।

28 नवंबर 2019 तक 19,40,313 डायरेक्टरों के ID डिएक्टिवेट हुए थे

यह तो हुई कंपनियों की बात लेकिन उनकी तरफ से नियमों के पालन में कोताही का जिम्मेदार उसके डायरेक्टरों को माना जाता है। ऐसे में कंपनी कानूनों में एनुअल रिटर्न फाइल नहीं करते हुए दो साल तक इनएक्टिव रहे और इसी में शामिल शेल कंपनियों के डायरेक्टरों को अयोग्य करने की भी व्यवस्था है। प्रेस इनफॉर्मेंशन ब्यूरो की तरफ से 3 दिसंबर 2019 को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 28 नवंबर 2019 तक कंपनी मामलों के मंत्रालय ने 19,40,313 डायरेक्टरों के आइडेंटिफिकेशन नंबर डिएक्टिवेट कर दिए थे।

2018-19 के दौरान 3,38,963 कंपनियों को डिस्क्वॉलिफाई किया गया था

वित्त और कंपनी मामलों के राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि कंपनी अधिनियम 2013 में घोस्ट डायरेक्टर और शेल कंपनियों को परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन वित्त वर्ष 2017-18 और वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान फाइनेंशियल स्टेटमेंट या एनुअल रिटर्न नहीं देने के चलते सेक्शन 248 के तहत 3,38,963 कंपनियों और इसके लिए 164 (2) (ए) के तहत 4,24,454 डायरेक्टरों को डिस्क्वॉलिफाई किया गया था।

वित्त वर्ष 2018 से मार्च 2020 तक 4.3 लाख इनएक्टिव कंपनियों के नाम कटे थे

चूंकि देश में शेल कंपनियों और इनएक्टिव कंपनियों के बीच फर्क करनेवाली कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए यह पता लगाना मुश्किल है कि सरकार की सख्ती से शेल कंपनियों पर कितना असर हुआ है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2018 से मार्च 2020 तक शेल कंपनियों सहित 4.3 लाख इनएक्टिव कंपनियों को कंपनी रजिस्ट्रार की बही से निकाला जा चुका था। यह बात जरूर है कि कंपनी मामलों के इस मामले में सख्ती करने के चलते नियमित रूप से रिटर्न फाइल करने वाली कंपनियों का प्रतिशत 82 तक पहुंच गया था जो वित्त वर्ष 2018 में 60 पर्सेंट था।



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By Raj

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