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5 घंटे पहले

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  • शुरुआती यूनिकॉर्न- मेकमायट्रिप, नौकरी.कॉम और जस्टडायल को बिलियन डॉलर वैल्यूएशन पाने में लगे थे 15 साल
  • रेजरपे, स्विगी, रिविगो और अनएकेडेमी ने लिए पांच साल; उड़ान, ओला इलेक्ट्रिक और ग्लांस को लगे सिर्फ 2.4 साल

2021 को आए महज दो महीने हुए हैं और देश की तीन कंपनियां यूनिकॉर्न बन गई हैं। बिलियन डॉलर वैल्यूएशन वाली स्टार्ट की लिस्ट में कंपनियां पहले से ज्यादा तेजी से जगह बना रही हैं। इस लिस्ट में पिछले महीने मुंबई की कंस्ट्रक्शन प्रोक्योरमेंट मार्केट प्लेस इंफ्रा.मार्केट और हेल्थकेयर टेक स्टार्टअप इनोवैक्सर की एंट्री हो गई। डिजिट इंश्योरेंस का वैल्यूएशन भी इस जनवरी में एक अरब डॉलर से ज्यादा हो गया था।

2018 से अब तक यूनिकॉर्न की संख्या 10 से बढ़कर 28 तक पहुंच चुकी है

2018 तक देश में 10 यूनिकॉर्न थीं और वेंचर इंटेलीजेंस के डेटा के मुताबिक, इनकी लिस्ट में अब तक 28 का इजाफा हो चुका है। यह तब हुआ है जब देश में व्यापक आर्थिक स्थितियां अनुकूल नहीं रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, एक इंडियन स्टार्टअप को यूनिकॉर्न बनने में लगभग आठ साल लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह पीरियड घट रहा है। ओरियोस वेंचर पार्टनर्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, नई स्टार्टअप पुरानी यूनिकॉर्न के मुकाबले ज्यादा तेजी से बिलियन डॉलर वैल्यूएशन हासिल कर रही हैं।

उड़ान, ओला इलेक्ट्रिक और ग्लांस को यूनिकॉर्न बनने में लगे हैं 2.4 साल

देश की सबसे पुरानी स्टार्टअप मेकमायट्रिप, नौकरी.कॉम और जस्टडायल 2005 से पहले शुरू हुई थीं। इनको बिलियन डॉलर वैल्यूएशन हासिल करने में लगभग 15 साल लगे थे। इनके मुकाबले रेजरपे, स्विगी, रिविगो और अनएकेडेमी जैसी स्टार्टअप औसतन पाँच साल में ही यूनिकॉर्न बन गईं। उड़ान, ओला इलेक्ट्रिक और ग्लांस को बिलियन डॉलर वैल्यूएशन हासिल करने में 2.4 साल लगे हैं।

ओरियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुरानी के मुकाबले नई स्टार्टअप को बिलियन डॉलर वैल्यूएशन ज्यादा जल्दी हासिल होने की एक वजह यह हो सकती है कि इनमें से ज्यादातर के फाउंडर को स्टार्टअप चलाने का पुराना अनुभव है और ये ज्यादा आसानी से फंड जुटा सकते हैं।

कम-से-कम 12 स्टार्टअप 2021 में बन सकती हैं यूनिकॉर्न

IT इंडस्ट्री बॉडी नैसकॉम के मुताबिक यूनिकॉर्न वाली लिस्ट में जल्द कई नाम जुड़ सकते हैं। नैसकॉम ने इसी साल जारी रिपोर्ट में कहा था कि कम से कम 12 का वैल्यूएशन 2021 में एक अरब डॉलर पार जा सकता है। टेक यूनिकॉर्न की संख्या में बढ़ोतरी की वजह इंडियन स्टार्टअप इकोसिस्टम में निवेशकों का भरोसा है।

KPMG इंडिया के मुताबिक, पिछले पाँच साल में प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल का इनवेस्टमेंट दोगुना हो गया है। इनमें न सिर्फ प्राइवेट इक्विटी इनवेस्टमेंट ज्यादा हो रहा है बल्कि इसमें पैसा भी लंबे समय के लिए लग रहा है। इससे पता चलता है कि इंडियन स्टार्टअप इकोसिस्टम मैच्योर हो चला है।

मैको इकोनॉमिक बाधाओं के बावजूद PE/VC इनवेस्टमेंट में हुई लगातार बढ़ोतरी

KPMG इंडिया ने 300 डील की स्टडी में पाया कि प्राइवेट इक्विटी फंड को कैपिटल मार्केट के कई सेक्टरों के मुकाबले ज्यादा सालाना रिटर्न मिला है। इसके मुताबिक, ‘मैको इकोनॉमिक बाधाओं के बावजूद प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल इनवेस्टमेंट में लगातार बढ़ोतरी हुई है। ये फंड हर ग्रोथ साइकिल वाली कंपनियों में निवेश के मौके तलाश रहे हैं।’

फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी सेक्टर की हैं ज्यादातर इंडियन यूनिकॉर्न

इंडिया में ज्यादातर यूनिकॉर्न फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी सेक्टर की हैं। इसके बाद रिटेल और SaaS स्टार्टअप का नंबर आता है। इससे पता चलता है कि पेमेंट कंपनियों की बाढ़ आने से पहले देश में बैंकिंग फैसिलिटी की बहुत कमी थी।

ओरियोस वेंचर पार्टनर्स के रेहान यार खान के मुताबिक, ‘बात लोन या वेल्थ मैनेजमेंट या पेमेंट की हो, बैंकिंग सिस्टम की जड़ें ज्यादा गहराई में नहीं जमी थीं। फिनटेक यूनिकॉर्न ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद कमियों को दूर करने की कोशिश की।’

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By Raj

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