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15 घंटे पहले

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देशभर में पेट्रोल का दाम घटकर 75 रुपए और डीजल 68 रुपए प्रति लीटर पर आ सकता है। इसके लिए इसको गुड्स और सर्विसेज टैक्स (GST) के दायरे में लाना होगा। लेकिन राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में ये काफी महंगे बने हुए हैं। SBI के अर्थशास्त्रियों ने गुरुवार को यह बात कही।

उनके मुताबिक, डीजल और पेट्रोल को GST के दायरे में लाने से केंद्र और राज्यों को एक लाख करोड़ रुपए (GDP का 0.4%) का रेवेन्यू लॉस हो सकता है। उन्होंने सारा हिसाब 60 डॉलर प्रति बैरल के क्रूड और 73 रुपए प्रति डॉलर के एक्सचेंज रेट पर लगाया है।

राज्य अपने हिसाब से टैक्स लगाता है, केंद्र ड्यूटी और सेस वसूल करता है

मौजूदा कर व्यवस्था में हर राज्य अपने हिसाब से पेट्रोल और डीजल पर टैक्स लगाता है और केंद्र अपनी ड्यूटी और सेस अलग से वसूल करता है। कुछ समय से देश में कई जगहों पर पेट्रोल की कीमत 100 रुपए प्रति लीटर के आसपास चल रही है जिसका जिम्मेदार लोग टैक्स को मान रहे हैं। SBI के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल को GST सिस्टम में लाए जाने से इस व्यवस्था को अपनाने का सरकार का मकसद पूरा हो जाएगा।

ऑयल प्रॉडक्ट्स पर लगता है ऐड वैलोरम टैक्स, सेस, एक्स्ट्रा वैट या सरचार्ज

SBI के अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, ‘केंद्र और राज्य ऑयल प्रॉडक्ट्स को GST सिस्टम में नहीं देखना चाहते क्योंकि सेल्स टैक्स/वैट उनकी कमाई का बड़ा जरिया है।’ राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से ऑयल प्रॉडक्ट्स पर ऐड वैलोरम टैक्स, सेस, एक्स्ट्रा वैट/सरचार्ज लगाते हैं। यह सब टैक्स क्रूड के दाम, ढुलाई भाड़े, डीलर कमीशन और केंद्र के उत्पाद शुल्क को जोड़ने के बाद लगाया जाता है।

SBI के अर्थशास्त्रियों ने इस तरह किया पेट्रोल और डीजल प्राइस का हिसाब-किताब

SBI के अर्थशास्त्रियों ने डीजल के लिए 7.25 रुपए के ढुलाई भाड़े, 2.53 रुपए के डीलर कमीशन और 20 रुपए के सेस पर हिसाब-किताब किया है। उन्होंने पेट्रोल के लिए 3.82 रुपए का ढुलाई भाड़ा, 3.67 रुपए का डीलर कमीशन और 30 रुपए का सेस लगाया है। उनके सुझाव में डीजल पर 20 और पेट्रोल पर 30 रुपए प्रति लीटर का सेस राज्यों और केंद्र में बराबर बांटना और 28% का GST लगाया जाना शामिल है।

कंज्यूमर को हर लीटर पर 10 से 30 रुपए तक की बचत होने लगेगी

GST सिस्टम में एक लाख रुपए के रेवेन्यू लॉस का आंकड़ा डीजल (15%) और पेट्रोल (10%) की खपत में बढ़ोतरी के आधार पर निकाला गया है। क्रूड के दाम में एक डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से पेट्रोल का दाम 50 पैसा और डीजल का दाम डेढ़ रुपए प्रति लीटर बढ़ेगा। जिन राज्यों को सबसे ज्यादा टैक्स रेवेन्यू मिलता है, पेट्रोल-डीजल को GST सिस्टम में लाने से उनका लॉस सबसे ज्यादा होगा, लेकिन कंज्यूमर को पेट्रोल और डीजल में हर लीटर पर 10 से 30 रुपए तक की बचत होने लगेगी।

क्रूड 10 डॉलर सस्ता होने पर राज्यों और केंद्र को 18,000 करोड़ की बचत होगी

इस उदाहरण में दिलचस्प बात यह है कि क्रूड 10 डॉलर प्रति बैरल सस्ता होने पर राज्यों और केंद्र को 18,000 करोड़ रुपए की बचत होगी। यह तब होगा जब दोनों प्राइस को बेसलाइन पर बनाए रखेंगे और घटे दाम का फायदा कंज्यूमर को नहीं देंगे। अगर क्रूड का दाम 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ता है लेकिन इसका बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाता तो 9,000 करोड़ रुपये की बचत होगी।

इसको देखते हुए SBI के अर्थशास्त्रिों ने सरकार को ऑयल प्राइस स्टैबिलाइजेशन फंड बनाने की सलाह दी है। उनके मुताबिक, ‘अच्छे वक्त में जमा की गई रकम से बने इस फंड का इस्तेमाल बुरे वक्त में रेवेन्यू लॉस की भरपाई में किया जा सकेगा। इससे बढ़े दाम का बोझ कंज्यूमर पर नहीं पड़ेगा।’

LPG सिलेंडर पर सब्सिडी बढ़ाकर पाँच साल में खत्म करने का सुझाव

उन्होंने LPG सिलेंडर पर गरीब उपभोक्ताओं को मिलने वाली सब्सिडी बढ़ाने और उसको पाँच साल में खत्म करने का सुझाव दिया है। इसके लिए सरकार आयुष्मान भारत, PM-KISAN, PMJDY, PMUY और MUDRA के डेटाबेस को मिलाकर बड़ा डेटाबेस बनाया जा सकता है।

सब्सिडी के दायरे में आने वालों को साल में ज्यादा से ज्यादा चार फ्री सिलेंडर दिया जा सकता है। ऐसे में अगर पाँच करोड़ लोगों को भी रसोई गैस पर सब्सिडी मिलती है तो सरकारी खजाने पर 16,000 करोड़ रुपए (5 करोड़ x 4 x 800 रुपए प्रति सिलेंडर) का बोझ पड़ेगा।

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By Raj

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